Arvind Kumar Bhardwaj

Arvind Kumar Bhardwaj

Thursday, 7 May 2015

“स्वानुसन्धान”
मानव जीवन का परमलक्ष्य अपने आप को जानना है। अपने स्वरूप का साक्षात्कार करना हमारे जीवन का ध्येय है, स्वरूपानन्द में प्रतिष्ठित रहना परमुद्देश्य की प्राप्ति का एक मात्र लक्षण है। अतीत तथा अतीत की अनुभूतियों से ऊपर उठ कर, सभी बन्धों को काट कर जो मनुष्य परमानन्द का अनुभव करता है, वही मनुष्य मुक्त है अर्थात् मोक्ष को प्राप्त है। मोक्ष परम पुरूषार्थ है, मोक्ष प्रत्येक प्राणी का अधिकार है। मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी वही है  जो अपने स्वरूप को जान लेता है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या है हमारा सच्चा स्वरूप? इस प्रश्न का उत्तर सैद्धांतिक स्तर पर सभी जानते है कि इस शरीर में आत्मा का वास है परन्तु प्रायोगिक स्तर पर लोग इसे भूल जाते हैं। हमारा शरीर  प्रकृति – जड़  है तथा आत्मा चेतन । प्रकृति में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, इसी कारण हमारा शरीर भी निरनन्तर परिवर्तनशील है- शरीर में निरन्तर वृद्धि तथा क्षय आदि घटनायें होती रहती हैं। आत्मा, ब्रह्मस्वरूप अपरिवर्तनशील, चेतन तत्व है जो परिवर्तनशील शरीर में रहकर भी प्रकृति के गुणों से लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार जल में तेल को डलने पर तेल जल में नहीं मिलता ठीक उसी प्रकार आत्मा भी शरीर में रहते हुये शरीर के गुणों से प्रभावित नहीं होता। शरीर नश्वर (मरणशील) है तथा आत्मा अनश्वर (अमर) । मैं यहाँ एक बात विशेष रूप से कहना चाहता हूँ – “जैसा जिसका भाव है, वैसा उसका काम” अर्थात् हम जो भी भाव रखते हैं वह हमारे कर्मों में निम्नाधिक रूप से अवश्य प्रकट होता है। हमारे हितैषी हमसे सदैव यही कहते हैं कि ऐसा काम करो जिसके करने से तुम्हारा नाम अमर हो जाये और स्वयं भी हम ऐसा ही करना चहते हैं। हम क्यों चाहते हैं कि हमारा नाम अमर हो? इसका उत्तर हमारे स्वरूप में निहित है। हम अमरता चाहते हैं क्योंकि हम अमर हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हमारा स्वरूप अनश्वर अर्थात् आत्मा है। हम शरीर को सदैव सम्बन्ध भाव से ही देखते है जैसे मेरा हाथ, मेरा पैर, मेरा चेहरा, मेरा रंग, मेरा शरीर आदि। जब ये हाथ,पैर, रूप, आदि मेरा है तो मैं कहाँ हूँ? मैं अपने चेहरे, नेत्र आदि को दर्पण में देख पा रहा हूँ परंतु मैं स्वयं को नहीं देख पा रहा हूँ। विचित्रता देखिये कि मैं दर्पण में अपने नेत्रों द्वारा अपने नेत्रों को ही देख रहा हूँ, तात्पर्य यह है कि देखने वाला मैं (आत्मा) हूँ परंतु दिखायी दे रहा है मेरा शरीर (प्रपञ्च)। यह प्रकृति का प्रपञ्च इतना रमणीय है कि हमारे अन्दर भ्रान्ति उत्पन्न कर देता है और हम अपने स्वरूप को जानते हुये भी उसे देख नहीं पाते। हमें सदैव अपने स्वरूप का चिन्तन करते रहना चहिये। जप, तप, साधना, उपासना आदि के माध्यम से मन का निग्रह करके अपने स्वरूप का ध्यान करना चाहिये। इसका अभ्यास करते रहना चाहिये। आत्मगत होने पर ब्रह्म प्राप्ति सुलभ हो जाती है। अब देखना यह है कि कौन आत्मगत होकर स्वयं को जान पाता है?
                                                                                                            ‌—अरविन्द कुमार भारद्वाज

                                                                                                                        07 May 2015

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