“कर्म तथा उपासना से ज्ञान तक”
साधक उपासना मार्ग द्वारा कर्मकाण्ड
और ज्ञानमार्ग का समुच्चय करने की चेष्टा करता है । बुद्धिमान् तर्कशास्त्री यह
कहते हैं कि मध्यम् मार्ग ही श्रेष्ठ है (मध्यम् मार्ग वह मार्ग है जिसमें कुछ अंश
ज्ञानकाण्ड का तथा कुछ अंश कर्मकाण्ड का होता है- ‘उपासना’)। उपासना मार्ग
कि यह विशेषता है कि यह कर्म और ज्ञानकाण्ड के अंशों को समाहित किये हुये है। कर्म
तो क्षीण होने वाला है, कर्म से प्रारंभ करके उपासना मार्ग
द्वारा ज्ञान के शाश्वतांश को प्राप्त करना उपासक का परमध्येय है। ज्ञान के अंश
मात्र में उसकी सम्पूर्ण राशि के समान पूर्णता है । उपासना द्वारा प्राप्त ज्ञान
के उस अंश मात्र को ही सही-सही समझ लेने से तथा उसको आत्मसात करने से सभी कर्म
तत्क्षण क्षीण हो जाते हैं (संचित कर्म राशि समाप्त हो जाती है, क्रियमाण कर्म भी ब्रह्मज्ञान के प्रसाद से शुभाशुभ फल देने वाले नहीं
रहते, बचते हैं मात्र प्रारब्ध कर्म,
तो वह भी देह पूर्ण होने पर समाप्त हो जाते हैं), तथा पुरूष
ब्रह्मात्मेक्य का बोध कर मुक्ति/ मोक्ष को जीवितावस्था में ही प्राप्त कर लेता
है। अतः मुक्ति कर्म से नहीं ज्ञान से ही सम्भव है। उपासना,
ज्ञान प्राप्ति में सहायक है अतः उपासना मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है परंतु
वह भी मोक्षदायिनी नहीं है। उपासना द्वैत व अद्वैत भावों को जोडनें वाला वह सेतु
है जिससे होकर पुरूष, तत्व को प्राप्त करता है। ना जाने
कितने साधक व उपासक ज्ञान प्राप्ति हेतु जन्मजन्मांतरों से उपासना व साधना कर रहे
हैं। वह कौन सा ज्ञान है जिसको पाने के लिये साधक जन्मों से उद्यम कर रहे हैं? क्या है उस ज्ञान का स्वरूप? वह ज्ञान कौन देता है? क्या गुरू ही उस ज्ञान को शिष्य के लिये देता है?
कहाँ है उस ज्ञान का भण्डार जहाँ से वह स्फुरित होता है?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने से
ही हमारा श्रेष्ठ हो सकता है। ज्ञान हमारे अंदर एक ज्योति के रूप में विद्यमान है, यह ज्ञान हमारे
स्मृति सागर में कहीं छिपा हुआ है अतः हमारी चेतनावस्था में परिलक्षित नहीं होता।
प्रारम्भ में पुरुष (आत्मा) इसी ज्ञान से ओत- प्रोत था परंतु जन्मजन्मांतरों में
किये गये कर्मों के प्रभाव से यह ज्ञान उसे विस्मृत हो जाता है, फिर संयोगवश पुरूष स्वयं को जानने की इच्छा करता है, यही इच्छा बलवती होकर पुरूष को कर्म से उठाकर,उपासना
में लगाकर उसके अन्तर्मन में उपलब्ध अनन्त व शाश्वत तत्वज्ञान तक ले जाती है। गुरू
एक मार्गदर्शक के रूप में अपने शिष्य को
उपासना/साधना के मार्ग पर चलाता है तथा उसका संरक्षण करता है ताकि उसके शिष्य के
उपासना पथ पर कोई भटकाव ना आ जाये। गुरू शिष्य की उपासना मार्ग पर चलने की गति को
त्वरित करता है जिसके परिणामस्वरूप योग्य शिष्य अपना अन्तर्मन्थन शीघ्रता से कर उस
परमज्ञान को प्राप्त कर लेता है। गुरू सदैव ज्ञान का उपदेश आदर्शों के रूप में ही
करते हैं, शिष्य उन आदर्शों का अनुसरण कर अपने अन्तर्मन में
छिपे हुये ज्ञान का साक्षात्कार करता है। यह ज्ञान किसी के देने से प्राप्त नहीं होता, ज्ञान तो उपासनामार्ग/ योगमार्ग/ साधनामार्ग पर चलने वालों को (कभी-कभी
प्रारब्धवश सामान्य जन को भी) स्वतः ही उनके अन्तर्मन में जाग्रत हो जाता है। जिस
प्रकार किसी बात के विस्मृत हो जानेपर वह बात किसी सामान्य वाक्य के सुनने,किसी दृश्य के देखने, किसी परिस्थिति का सामना करने
इत्यादि द्वारा स्मृति में पुनः आ जाती है, उसी प्रकार हमारे
अंदर छिपा तत्वज्ञान स्वतः ही हमारे विशाल स्मृति सागर से स्फुरित होकर आत्मा को
आनंदित कर देता है। जिस प्रकार हम केले के फल को खाते समय केले की गिरी ग्रहण करने
के पश्चात् उसके छिलके को फेंक देते हैं उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति होने के
पश्चात् कर्मकाण्ड और उपासना का कोई महत्त्व नहीं रहता है। यहाँ तक कि हमारे शेष
जीवन का कोई महत्त्व नहीं रहता क्योंकि पुरूष ज्ञान की प्राप्ति कर जीवन के
परमलक्ष्य को प्राप्त कर लेता है । यह अवस्था जीवनमुक्तावस्था है जिसमें मनुष्य
जीवित रहते हुये मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। यही परमहंसावस्था है , यही जीवन की सर्वोच्चावस्था है।
ब्रह्म और आत्मा की एकरूपता का ज्ञान
हो जाना ही ‘ब्रह्मज्ञान’ कहलाता है तथा ब्रह्मात्मेक्य की
निरंतर चिरस्थिति ही मोक्ष है। इस स्थिति में पुरुष विरक्त हो एकांतप्रिय हो जाता
है। क्या है एकांत? ब्रह्मज्ञानी एकान्तप्रिय क्यों होता है? सभी प्राणियों व वस्तुओं के प्रति समभाव रखते हुये ब्रह्मचिंतनमय रहना ही
एकांत है। सब कुछ मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न कुछ हैं ही नहीं
तो मेरी रूचि भी किसी प्राणी, वस्तु व पदार्थ में नहीं -
ऐसी अवस्था विरक्तावस्था कहलाती है। ऐसा विरक्तेकान्ती चाहे चमक दमक से भरे शहर
में रहे या फिर निर्जन वन में, वह मुक्त ही है।
—अरविन्द
कुमार भारद्वाज
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