“आधुनिक समाज में तन्त्र की अवधारणा”
आधुनिकता
की धुंध में तंत्र का वास्तविक स्वरूप ओझल हो गया है। आज का समाज तन्त्र का केवल
एक हि अर्थ निकालता है और वो है जादू, टोना,टोटके आदि । परंतु
सत्य तो इससे बिल्कुल भिन्न है। मन्त्रों द्वारा मन का नियंत्रण करके, यंत्र रूपी शरीर (तन) से ऊपर ऊठ कर अपने स्वरूप को जान लेना हि तंत्र का
उद्देश्य है अर्थात् तंत्र आत्मानुभूति अथवा तत्वानुभूति का ही एक मार्ग है। मोक्ष
को प्राप्त करने के अनेक अन्य मार्ग हैं जैसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग, भक्तियोग, प्रेमयोग, शरणागति आदि।
इतिहासकारों
और अनुसंधान कर्ताओं के अनुसार तंत्र ५०० ई० से अधिक पुराना नहीं है क्योकि तंत्र का
साहित्य ५०० ई० के बाद का है। मैं अनुसंधान कर्ताओं के मत से इतर मत रखता हूँ।
तंत्र का स्वरूप रहस्यमय है। तंत्र प्राचीन काल से ही गुप्त विद्या के रूप में
प्रतिष्ठित रहा है तथा गुरू शिष्य परम्परा द्वारा ही इसका अग्रसरण किया जाता रहा
है। अथर्ववेद तो तंत्र का भण्डार है, अतः यह कहना सही नहीं होगा कि तंत्र ५०० ई०
से अधिक पुराना नहीं है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि तंत्र के ग्रंथ ५०० ई० के
पश्चात प्रकाश में आये।
सनातन
धर्म की परम्परा में मोक्ष को परम पुरूषार्थ माना गया है, मोक्ष ही जीवन का
परम लक्ष्य है। कौन ऐसा मनुष्य है जो परमता को प्राप्त नहीं करना चाहता? हम सभी आगे बढना चाहते हैं। परंतु इस आधुनिकता की दौड में भौतिकोत्थान
चाहने वालों की संख्या मुमुक्षुओं (मोक्ष चाहने वालों) से कहीं अधिक है। अधिकांश
लोग मोहवश भौतिक साधनों की अधिकता को उत्थान मानते हैं तो मुमुक्षु लोग आध्यात्मिक
उन्नति को ही उत्थान कि संज्ञा देते हैं। यह माया मोह के कारण उत्पन्न हुआ भेद ही तंत्र
के स्वरूप के विघटन का कारण है।
ज्ञानीजन
इस सत्य से भलीभाँति अवगत हैं कि तांत्रिक साधनाओं का अधिकारी मुमुक्षु ही है। यह सर्वविदित
है कि तंत्रमार्ग एक दोधारी तलवार के समान है। ऐसा इस लिये कहा जाता है क्योकिं तांत्रिक
साधनओं के पथ पर साधकों को अनेकोंनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, यह सिद्धियाँ साधक के
मन को भटकाने में सक्षम होती हैं, इसका तात्पर्य यह है कि सिद्धियों
को प्राप्त करने के पश्चात साधक को भोग की कुंजी मिल जाती है जिसके द्वारा भौतिक पदार्थों
तथा परिस्थितिओं में परिवर्तन किया जा सकता है। यहाँ यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं
होगी कि इस तरह के परिवर्तन की कोई वैज्ञानिक व्याख्या अभी तक प्रस्तुत नहीं हुई है
क्योकिं हमारा आधुनिक विज्ञान अभी भौतिकता के अनुसंधान में व्यस्त है, उसे भी माया के जाल ने जकडा हुआ है। बहरहाल, तांत्रिक
साधनाओं में प्राप्त होने वाली सिद्धियों से मिलने वाला भौतिक उत्कर्ष, साधक के लिये एक दलदल के समान है, जो साधक शमदमादि द्वारा
मन तथा इंद्रियों का निग्रह करके आगे निकल जाता है वही परमपुरूषार्थ मोक्ष को प्राप्त
करता है।
आगमशास्त्र, यामल, व तंत्रग्रंथों में साधना करने हेतु जो मार्गदर्शन किया गया है, वह स्पष्ट रूप से दो प्रकार का है- दक्षिणमार्गी तथा वाममार्गी। इन दोनों
मार्गों के साधनाक्रम में पर्याप्त समानता है परंतु आचरणक्रम में अत्याधिक अंतर दृष्टिगोचर
होता है। मार्ग चाहे कोई भी हो, यदि साधक अनुशासनबद्ध होकर साधना
करता है तो वह निश्चय ही परमपद को प्राप्त कर लेता है। साधक को उसके लक्ष्य की प्राप्ति
एक क्षण में होगी अथवा एक कल्प में अथवा इससे अधिक समय में, इसका
सम्बंध साधक द्वारा पूर्वार्जित कर्म तथा साधक के प्रारब्ध से है। संक्षेप में यह कहा
जा सकता है कि साधक द्वारा की जाने वाली साधना का पूर्ण होना साधक की व्यक्तिगतयोग्यता
तथा उसके कर्मों पर निर्भर करता है।
कलियुग
में शक्तिसाधना ही उद्धारकारिणी कही गयी है। शक्तिसाधना तंत्र का पर्याय है। हमारे
शरीर में अनेकों जैविक क्रियायें निरंतर होती रहती है तथा हमें उनका आभास तक नहीं होता।
इन सभी जैविक क्रियाओं के घटनाक्रम का कारण वह असीम शक्ति है जो इस यंत्र रूपी शरीर
में विद्यमान है। इस शक्ति के शरीर में न रहने पर शरीर शव मात्र रह जाता है। इस शक्ति
का साक्षात्कार हो जाना ही आत्मानुभूति है। यह शक्ति ही शरीर की सञ्चालिनी है। प्रत्येक
सजीव के शरीर में, निर्जीव पिण्डों में तथा अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त होने के कारण यह शक्ति
ही सर्वव्यापिनी है। यह शक्ति ही आकाश में शून्यता की भाँति अरूपा तथा शब्द की भाँति
सरूपा है, यही अग्नि में उष्णता की भाँति अरूपा तथा तेज की भाँति
सरूपा है। यह शक्ति ही कण्ठ से वाक् रूप में प्रकट होती है। यह शक्ति ही किसी विशेष
कार्य को करने के लिये बल रूप में प्रकट होती है। यह शक्ति ही माँस, अस्थि, मज्ज्ज, रक्त तथा वीर्यादि
का वर्धन व पोषण करती है। यह शक्ति ही सृष्टि का सृजन करती है अतः यह जननी है तथा यह
शक्ति ही निखिल ब्रह्माण्ड का मूल है अतः यह माँ है।
यह
शक्ति ही परब्रह्म (परमात्मा) है तथा यही हमारे शरीर में स्थित कार्यब्रह्म (आत्मा)
भी है। परब्रह्म तथा कार्यब्रह्म की एकरूपता को जान लेना अर्थात् शक्ति के स्वरूप को
जान लेना ही तंत्र का ध्येय है। तंत्र मूल रूप से अद्वैत है। सफल तांत्रिकों का यह
कर्त्तव्य है कि वह समाज में फैल रही तंत्र के स्वरूप की विकृति को रोक कर तंत्र के
वास्तविक स्वरूप का परिचय समाज के समक्ष प्रस्तुत करें।
—अरविन्द
कुमार भारद्वाज
20
May 2015