ईशावास्योपनिषद्
शुक्लयजुर्वेदसंहिता
का ४० वाँ अध्याय ही ईशावास्योपनिषद् है। ईशावास्योपनिषद् को सबसे पहला उपनिषद्
माना जाता है। ईशावास्योपनिषद् में कुल १८ श्लोक हैं जिनका सरलार्थ यहाँ प्रस्तुत
है।
शान्तिपाठ
ॐ
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते ॥ (बृ॰ ५.१.१)
ॐ
शान्तिः शान्तिः शान्तिः
अखिल
ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड-चेतनस्वरूप जगत् है, यह समस्त ईश्वर से व्याप्त है। उस ईश्वर को साथ रखते हुए त्यागपूर्वक इसे
भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ क्योंकि धन (भोग्य-पदार्थ)
किसका है अर्थात् किसी का भी नहीं है।१। शास्त्रजनित कर्मों को ईश्वरपूजार्थ करते
हुए ही इस जगत् में सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिये। इस प्रकार त्याग भाव
से परमेश्वर के लिये किये जाने वाले कर्म तुझ मनुष्य में लिप्त नहीं होंगे, इससे भिन्न अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग नहीं है जिससे कि मनुष्य कर्म
से मुक्त हो सके ।२। असुरों की जो प्रसिद्ध नाना प्रकार की योनियाँ एवं नरकरूप लोक
हैं वे सभी अज्ञान तथा दुःख-क्लेश रूप महान् अन्धकार से आच्छादित हैं। जो कोई भी
आत्मा की हत्या करने वाले (जो आत्मा के स्वरूप को नहीं जान पाते) हैं वे मरकर
उन्हीं भयंकर लोकों को बार बार प्राप्त होते हैं।३। वह परमेश्वर अचल एक और मन से
भी अधिक तीव्र गतियुक्त है, सबका आदि,
ज्ञानस्वरूप या सबका जानने वाला है। इस परमेश्वर को इन्द्रादि देवता भी नहीं पा
सके या जान सके, वह परब्रह्म दूसरे दौड़ने वालों को स्वयं
स्थित रहते हुये ही अतिक्रमण कर जाते हैं, उनके होने पर ही –उन्हीं
की सत्ता शक्ति से वायु आदि देवता जलवर्षा, जीव की
प्राणधारणादि क्रिया प्रभृति कर्म सम्पादन करने में समर्थ होते हैं।४। वह
(परब्रह्म) चलता है, वह नहीं चलता है,
वह दूर से भी दूर है, वह अत्यन्त समीप है, वह इस समस्त जगत् के भीतर परिपूर्ण है और वह इस समस्त जगत् के बाहर भी है।५।
जो मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों को परमात्मा में निरन्तर देखता है, और सभी प्राणियों में परमात्मा को देखता है फिर वह किसी से घृणा नहीं
करता।६। जिस स्थिति में परब्रह्म परमेश्वर को भलीभाँति जानने वाले महापुरुष के
अनुभव में सम्पूर्ण प्राणी एकमात्र परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं, उस अवस्था में एकता का निरन्तर साक्षात् करने वाले पुरुष के लिये कौन सा
मोह, कौन सा शोक रह जाता है? (वह शोक
मोह से सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है)।७। वह
महापुरुष, उस परम तेजोमय सूक्ष्मशरीर से रहित, क्षतरहित, स्थूल पाञ्चभौतिक शरीर से रहित, अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप,
शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य उस परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है जो सर्वद्रष्ट, ज्ञानस्वरूप, सर्वनियन्ता,
स्वेच्छा से प्रकट होने वाला और अनादि काल से सब प्राणियों के कर्मानुसार यथायोग्य
सम्पूर्ण पदार्थों की रचना करता आया है।८। जो मनुष्य अविद्या (कर्मों) की उपासना
करते हैं वे अज्ञानस्वरूप घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो मनुष्य विद्या
(शास्त्र अथवा ज्ञान के मिथ्याभिमान) में रत हैं वे उससे भी अधिक अन्धकार में
प्रवेश करते हैं।९। ज्ञान के यथार्थ अनुष्ठान से अन्य ही फल बतलाते हैं और कर्मों
के यथार्थ अनुष्ठान से अन्य ही फल बतलाते हैं, इस प्रकार
हमने उन धीर पुरुषों के वचन सुने हैं जिन्होंने हमें उस विषय (तत्त्व) को भलीभाँति
समझाया था।१०। जो मनुष्य उन दोनों को अर्थात् ज्ञान के तत्त्व को और कर्म के
तत्त्व को भी साथ साथ यथार्थतः जान लेता है, वह कर्मों के
अनुष्ठान से मृत्यु को पार करके ज्ञान के
अनुष्ठान से अमृत को भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तम
को प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है।११। जो मनुष्य विनाशशील देव-पितर आदि की उपासना
करते हैं वे अज्ञानस्वरूप घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो मनुष्य अविनाशी
परमात्मा (उपासना के मिथ्याभिमान) में रत हैं वे उससे भी अधिक अन्धकार में प्रवेश
करते हैं।१२। अविनाशी परमात्मा की उपासना से अन्य ही फल बतलाते हैं और विनाशशील
देव-पितर आदि की उपासना से अन्य ही फल बतलाते हैं, इस प्रकार
हमने उन धीर पुरुषों के वचन सुने हैं जिन्होंने हमें उस विषय (तत्त्व) को भलीभाँति
समझाया था।१३। जो मनुष्य उन दोनों को अर्थात् अविनाशी परमात्मा को और विनाशशील
देव-पितर आदि को भी साथ साथ यथार्थतः जान लेता है, विनाशशील
देव-पितर आदि की उपासना से मृत्यु को पार करके अविनाशी परमात्मा की उपासना से अमृत
को भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्रत्यक्ष प्राप्त हो
जाता है।१४। हे सबका भरण पोषण करनेवाले परमेश्वर ! सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वर का
श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप हिरण्मय पात्र से ढका हुआ है, आप की भक्तिरूप सत्य धर्म का अनुष्ठान करने वाले (मुझको) अपने दर्शन
कराने के लिए, उस आवरण को आप हटा लीजिए ।१५। हे भक्तों का
पोषण करने वाले ! हे मुख्य ज्ञान स्वरूप ! हे सबके नियनन्ता ! हे ज्ञानियों
(सूरियों) के परमलक्ष्यरूप! हे प्रजापति के प्रिय! इन रश्मियों को एकत्र कीजिएया
हटा लीजिए, इस तेज को समेट लीजिए या अपने तेज में मिला लीजिए।
जो आपका अतिशय कल्याणमय दिव्य स्वरूप है, उस आपके दिव्य
स्वरूप को मैं आपकी कृपा से ध्यान के द्वारा देख रहा हूँ; जो
वह है, वह परम पुरुष मैं भी हूँ।१६। अब ये प्राण और इन्द्रियाँ
अविनाशी समष्टि वायु तत्त्व में प्रविष्टहो जायें, यह स्थूल शरीर
अग्नि में जल कर भस्म रूप हो जाए। हे ॐ ! यज्ञमय भगवन् ! आप मुझ भक्त को स्मरण करें; मेरे द्वारा किये हुए कर्मों का स्मरण करें; आप मुझ
भक्त को स्मरण करें; मेरे द्वारा किये हुए कर्मों का स्मरण करें।१७।
हे अग्नि के अधिष्ठातृ देवता ! हमें परम धनरूप परमेश्वर की सेवा में पहुँचाने के लिये
सुन्दर शुभ मार्ग से आप ले चलिये; हे देव! आप हमारे सम्पूर्ण
कर्मों को जानने वाले हैं अतः हमारे इस मार्ग के प्रतिबन्धक यदि कोई पाप हैं तो उन
सबको आप दूर कर दीजिये, आपको बार बार नमस्कार के वचन हम कहते
हैं - बार बार नमस्कार करते हैं।१८।
(गीताप्रेस गोरखपुर-उपनिषद् अंक से संकलित)
॥इति
॥
— ब्र. अरविन्द प्रकाशः
०१-११-२०१५