“कर्म की पवित्रता का मूल”
कोई भी प्राणी कर्म किये बिना नहीं
रह सकता, कर्म और देह का
परस्पर घनिष्टतम सम्बन्ध है। प्राणीयों की शारीरिक तथा मानसिक प्रवृत्तियों का
क्रियान्वित रूप ही कर्म है। प्रत्येक मनुष्य की अलग प्रवृत्ति होती है जिसके कारण
उसकी विचारधारा तथा उद्देश्य भिन्न होते हैं। मनुष्य की प्रवृत्ति का निर्धारण उसकी
प्रकृति में निहित त्रिगुणीसामंजस्य से होता है। जिनमें सतोगुण की प्रधानता होती है
उनकी प्रकृति सात्विक होती है तथा प्रवृत्ति ‘निवृत्ति’ में होती है। रजोगुण तथा तमोगुण की प्रधानता वाले लोगों में भोग तथा स्वार्थ
की उत्तरोत्तर अधिकता रहती है। गुणों की यह भिन्नता ही मनुष्यों की विचारधारा को प्रभावित
करती है। मनुष्य जैसी सोच रखता है तथा जैसे वातावरण में रहता है वह उसके उद्देश्य में
झलकता है। संयोगवश विधाता ने मनुष्य को कर्म करने की स्वतन्त्रता दी है, उसे बुद्धि तथा धृति से समपन्न किया है। जो अपने अन्दर छिपे हुये मैल को पहचान
कर उस मैल का मार्जन कर लेता है, उस मनुष्य के उद्देश्य में पवित्रता
आ जाती है और अन्ततः उद्देश्य की पवित्रता से ही कर्म पवित्र होता है।
—अरविन्द कुमार भारद्वाज
20 Aug 2015